बिहार के पूर्व क्रिकेटर ने बयां किया अपना दर्द: कैसे जिला क्रिकेट संघ की राजनीति ने बर्बाद किया भारतीय अंडर-16 खिलाड़ी का करियर
Published - 06 Nov 2026, 11:13 AM | Updated - 06 Nov 2026, 11:21 AM
Bihar: भारतीय क्रिकेट में अपना नाम कमाने का सपना हर गली-मोहल्ले का युवा संजोता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। जब किसी उभरते खिलाड़ी का सामना खेल की गंदी राजनीति और प्रशासनिक गुटबाजी से होता है, तो प्रतिभाएं दम तोड़ देती हैं। बिहार (Bihar) के सहरसा जिले से आने वाले पूर्व क्रिकेटर विष्णु कुमार की दास्तान भी इसी दर्दनाक सच का आईना है। राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया कैंप तक का सफर तय करने वाला यह होनहार खिलाड़ी सिस्टम की बेरुखी, अपमान और घरेलू जिम्मेदारियों के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो गया।
पटेल मैदान से राष्ट्रीय कैंप तक: Bihar के लाल का संघर्ष भरा सफर

विष्णु कुमार के क्रिकेट का सफर साल 2009 में सहरसा के पटेल मैदान से परवान चढ़ा था। मनोहर हाई स्कूल की ओर से ट्रायल देने पहुंचे इस युवा बल्लेबाज की प्रतिभा को कोशी स्पोर्ट्स अकादमी के कोच और सहरसा जिला के शारीरिक शिक्षक रोशन सिंह धोनी ने पहली नजर में ही भांप लिया।
उन्होंने विष्णु को एमएलटी कॉलेज ग्राउंड पर नियमित ट्रेनिंग की सलाह दी और आर्थिक तंगी के बावजूद उनका पूरा खर्च अकादमी ने उठाया। विष्णु ने भरोसे को सही साबित करते हुए 2010, 2011 और 2013 के SGFI अंडर-16 स्टेट टूर्नामेंट्स में बल्ले और गेंद से गदर मचाया।
नतीजतन, 2013 में उन्हें SGFI अंडर-16 इंडिया कैंप के लिए चुना गया। भले ही वह भारतीय दल विदेशी दौरे पर नहीं जा सका, लेकिन इसने साफ कर दिया कि विष्णु में अंतरराष्ट्रीय स्तर का दम था।
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भरे मैदान में फेंक दिया गया था किटबैग

राष्ट्रीय कैंप से लौटने के बाद जहां विष्णु को प्रोत्साहन मिलना चाहिए था, वहीं वे बिहार क्रिकेट एसोसिएशन (Bihar Cricket Association) और जिला संघ की आंतरिक गुटबाजी का शिकार बन गए। साल 2014-15 के अंडर-16 कैंप ट्रायल के दौरान उनके साथ बेहद अमानवीय सुलूक किया गया।
सहरसा जिला क्रिकेट संघ की ओर से झूठी शिकायत की गई कि वे संघ की बातें नहीं सुनते। इसके बाद दूसरे साथी खिलाड़ियों के सामने उनका किटबैग उठाकर मैदान से बाहर फेंक दिया गया।
दरअसल, सहरसा जिला क्रिकेट संघ के तत्कालीन सचिव बादल बनर्जी के प्रभाव के चलते कोशी स्पोर्ट्स अकादमी के लड़कों को जानबूझकर दरकिनार किया जाता था, ताकि वे सचिव के अपने क्लब 'फ्रेंड्स क्रिकेट क्लब' का रुख करें। इस लगातार अपमान ने इस युवा प्रतिभा की हिम्मत तोड़ दी।
चार बहनों का बोझ और Bihar क्रिकेट को हमेशा के लिए अलविदा
सिस्टम की बेरुखी और साजिशों के बीच वक्त फिसलता गया और विष्णु अंडर-19 की उम्र सीमा भी पार कर गए। घर की माली हालत पहले से ही डांवाडोल थी। पिता रिक्शा चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते थे, लेकिन ढलती उम्र और बीमारी के कारण वह सहारा भी छिन गया।
घर का सबसे बड़ा बेटा होने के नाते चार बहनों की शादी, घर का चूल्हा और भविष्य की चिंताएं उनके कंधों पर आ गिरीं। खेल में कोई उम्मीद न देख और चारों तरफ से घिरने के बाद आखिरकार साल 2022 में विष्णु ने भारी मन से क्रिकेट को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
विष्णु की यह दास्तान दिखाती है कि बिहार (Bihar) में प्रशासनिक खींचतान ने कैसे एक राष्ट्रीय स्तर के टैलेंट की बलि चढ़ा दी। यह कहानी सिर्फ विष्णु तक ही सीमित नहीं है इस गंदे खेल का शिकार कई खिलाड़ी हो चुके हैं।
इसी गंदे राजनीति का परिणाम है कि बिहार (Bihar) मौजूदा सत्र में चल रहे रणजी ट्रॉफी में खेले गए अपने चारों मुकाबले में टीम को हार का सामना करना पड़ा है। एक वक्त ऐसा भी आया था कि हर जिले में दो-दो संघ चलाए जा रहे थे, जिसका सीधा असर खिलाड़ियों पर पड़ता था।
(ऊपर दिए गए सभी जानकारी पूर्व खिलाड़ी विष्णु कुमार के द्वारा उपलब्ध कराई गई है)
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यह लेखक Cricketaddictor का एक सदस्य है जो क्रिकेट से जुड़ी खबरों और विश्लेषण पर लिखता है।