सौरव गांगुली

भारत में क्रिकेट को धर्म कहा जाता है. इसलिए जब किसी को रणजी स्तर पर भी खेलने का मौका मिलता है तो वो खिलाड़ी और उसका परिवार बहुत ज्यादा खुश हो जाता है. लेकिन पूर्व भारतीय कप्तान और मौजूदा बीसीसीआई के अध्यक्ष सौरव गांगुली को जब रणजी टीम में जगह मिली तो उनका परिवार निराश हो गया था. जिसका कारण दादा ने बताया था.

सौरव गांगुली को टीम में जगह मिली तो परिवार हुआ निराश

रणजी ट्रॉफी में जब पहली बार सौरव गांगुली को खेलने का मौका मिला तो उनका पूरा परिवार निराश था. जिसके बारें में खुद दादा ने एक समारोह में बताया था. ये बात 1990 की रही थी. उस समय दादा 12वीं कक्षा में पढ़ते थे. एक दिन वो ट्यूशन से वापस लौटे तो देखा की पूरा परिवार निराशा के साथ बैठा हुआ नजर आ रहा था.

जिसपर दादा ने अपनी माँ से खाना मांगते हुए उनके निराशा का कारण पूछा तो पता चला के उनके बड़े भाई स्नेहाशीष गांगुली को बंगाल रणजी टीम से बाहर कर दिया गया है. जिसपर दादा ने कहा की कोई बात नहीं अगले सीजन में खेल लेंगे. जवाब में माँ ने बताया की उनकी जगह तुमको टीम में शामिल किया गया है. जिसके बाद दादा को समझ नहीं आया है की भाई के बाहर होने पर निराश हो याँ खुद के लिए खुश.

भाई स्नेहाशीष के साथ बंगाल टीम में खेले हैं दादा

बाद में खुलासा हुआ की दिल्ली के खिलाफ रणजी फाइनल में बंगाल की टीम को एक आलराउंडर की जरुरत थी. जिसके कारण टीम में सौरव गांगुली को मौका दिया गया था. दादा उस समय मध्यम गति से गेंदबाजी करते हुए नजर आते थे. बाद में दोनों भाइयो ने साथ में रणजी ट्रॉफी टूर्नामेंट खेला था.

स्नेहाशीष गांगुली ने बंगाल की टीम के लिए 59 फर्स्ट क्लास मैच में 39.59 के औसत से 2534 रन बनाये थे. जिसमें 11 अर्धशतक और 6 शतक भी शामिल था. लिस्ट ए फ़ॉर्मेट में उन्होंने 18 मैच खेला था. जिसमें उन्होंने 18.33 के औसत से 275 रन बनाये थे. जिसमें 1 अर्धशतक भी शामिल रहा था. हालाँकि उसके बाद वो भारत के लिए नहीं खेल पायें.

आज सफलता के नए मुकाम बना चुके हैं सौरव गांगुली

बाद में सौरव गांगुली को भारतीय टीम में 1992 में ही जगह मिल गयी. लेकिन उसके बाद वो बाहर हो गये. लेकिन 1996 में जब उन्होंने वापसी की तो उसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. वो भारत के लिए सफल कप्तान और खिलाड़ी भी बन गये. आज वो बीसीसीआई के अध्यक्ष के रूप में काम करते हुए नजर आ रहे हैं. वो लगातार टीम को लीड कर रहे हैं.