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भारतीय खिलाड़ियों में क्रिकेट को लेकर एक अलग ही जूनून देखने को मिलता है. कई क्रिकेट खिलाड़ी ऐसे भी होते हैं जिन्होंने अपने खेल को कई मुश्किल समय पर भी नहीं छोड़ा. इसमें महान खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली जैसी बड़े नाम शमिल हैं.

वहीं कई खिलाड़ी क्रिकेट को लेकर अपना पढ़ाई तक छोड़ देते हैं. लेकिन इस बार हम आपको भारतीय क्रिकेट टीम के एक ऐसे खिलाड़ी के बारे में बता रहे हैं, जिसने इंजीनियरिंग के लिए क्रिकेट खेलना छोड़ दिया.

डेब्यू करने के बाद पढ़ाई के लिए छोड़ दिया क्रिकेट 

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जिस खिलाड़ी की बात कर रहे हैं उनका नाम इरापल्ली प्रसन्ना है. इरापल्ली प्रसन्ना  दुनिया के महान ऑफ़ स्पिनरों में शुमार किए जाते हैं. 22 मई 1940 को कर्नाटक के बैंगलोर शहर में जन्‍मे प्रसन्ना को नारी कॉन्ट्रैक्टर के नेतृत्व में 1961 में वेस्टइंडीज जाने वाली भारतीय टीम के लिए जब चुना गया था. तब वे इंजीनियरिंग के छात्र थे. हालांकि इससे पहले वह इंग्‍लैंड के खिलाफ चेन्‍नई टेस्‍ट में डेब्‍यू कर चुके थे. इस टेस्‍ट को नारी कॉन्ट्रैक्टर की टीम ने 128 रन से अपने नाम किया. जबकि प्रसन्‍ना को सिर्फ एक विकेट मिला था.

प्रसन्ना के पिता को मनाने के लिए मैसूर के महाराज को आना पड़ा था 

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भारतीय क्रिकेट टीम में जगह मिलने से प्रसन्ना काफी खुश थे, लेकिन पढ़ाई छोड़ कर क्रिकेट खेलना उनके पिता को पसंद नहीं था. जिसके कारण उनके पिता काफी नाराज थे. इस वजह से उन्होंने (इराल्ली प्रसन्ना) भारतीय चयनकर्ताओ को बताया कि पढाई बीच में छोड़ कर उनके पिता वेस्ट इंडीज नही जाने देंगे. तब मैसूर के अंतिम महाराजा श्री श्री जया चामराजेंद्र वाडियार बहादुर  को प्रसन्ना के घर उनके पिता को मानाने के लिए आना पड़ा. इसके बाद जो हुआ वो हर किसी के लिए हैरान करने वाला था. आखिरकार पिता ने इस शर्त पर इजाजत दी कि वह वेस्टइंडीज से लौटकर अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे.

प्रसन्ना के लिए वेस्टइंडीज दौरा कुछ अच्छा नहीं रहा 

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वेस्ट इंडीज दौरा भारतीय टीम और प्रसन्ना दोनों के लिए अच्छा नहीं रहा. इराल्ली प्रसन्ना ने एक टेस्‍ट मैच खेला और इस दौरान उन्‍होंने 50 ओवर गेंदबाजी करते हुए 122 रन देकर तीन विकेट लिए, जो कि विंडजी की एकमात्र पारी में भारत के लिए सर्वोच्‍च प्रदर्शन था. हालांकि भारत को एक पारी और 18 रन के अंतर से मात खानी पड़ी. इस दौरे के एक टेस्ट मैच में कप्तान कॉन्ट्रैक्टर के सिर पर चार्ली ग्रिफिथ की गेंद लगी और उनकी जान जाते जाते बची. उनका क्रिकेट करियर खत्म हो गया और युवा नवाब पटौदी को बीच दौरे में कप्तान बना दिया गया.

इराली प्रसन्ना का आगे का भविष्य काफी उजला रहा. भारत लौटने के बाद उन्होंने अपनी इंजीयरिंग की पढ़ी पूरी की. उसके बाद भारतीय क्रिकेट टीम ने जमकर उनका स्वागत किया. भारतीय क्रिकेट टीम से दुबारा जुड़ने के बबाद उन्होंने अपना पहला दौरा इंग्लैण्ड का किया. यह दौरा उनके लिए औसतन सफल रहा.

उसके बाद ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर उनका प्रदर्शन ऐसा रहा कि ऑस्ट्रेलियाई किसी और को उनसे बड़ा ऑफ स्पिनर मानने के लिए तैयार नहीं होते थे. इराल्ली प्रसन्ना ने 1962 से लेकर 1978 तक की टेस्ट करियर में 49 टेस्ट मैच खेले और 30.38 की औसत से 189 विकेट लिए.

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